Thursday, 8 March 2018

अब बस मैं !

मैं अठखेलती नदी सी
मैं ही शांत झील भी
कभी मैं ठंडी मीठी चाँदनी
मैं झुलसाती दोपहरी भी
मुझ में ही बसी है वीरानी
मेले रमे मुझ में ही
कभी तरल पिघलती हुयी
बर्फ़ भी जमे मुझ में ही
मेरे क़दमों की आहट है
रुकी हुयी कहानी में
मेरे दिल की धड़कन है
आग की रवानी में ।
अब कोई तलाश नहीं बाक़ी
अब मैं ही हूँ ...मेरा वजूद ! ❤️