Friday, 31 October 2014

नया सा...

चल फिर उसी राह पर चलें
जहां नयी सुबह आती है
नयी रौशनी छाती है
कुछ नए ख़्वाबों के साये में
फिर नयी खुशबू महकाती है
और नए कोरे कैनवस पर
फिर नए रंग छलकाती है
जहां नयी नवेली पलकों से
नमी दूर हो जाती है
जहां दबे दबे ही सही
पर होंठों पे मुस्कान आती है
वह नया नया सा जहां होगा
पर फिर भी मेरा वहाँ होगा
हर नया दिन हर नया पल
मेरा नया आज, मेरा नया कल! 

Wednesday, 29 October 2014

रात की चादर..


झरोखे हैं बंद, ये खिड़की अधखुली,
कैसे किसी की याद से परदे हिले ज़रा
अंधेरो से दिल लगा लिया, दी रौशनी मिटा
अब शाम के ढलने में आने लगा मज़ा!

चुपचाप सी हैं साँसे, खामोश है ज़ुबां
फिर अपने खयालों पे साया हुआ घना
क्या घर की देहरी पे परछाईं  है कोई
दस्तक की तो आज भी आहट नहीं ज़रा!

ये रात की है चादरऔर चाँद का बिछौना
तकिये पे आंसुओं का है दाग भी पड़ा,
बस आँख बंद करने को मन नहीं मेरा
के  ख्वाब में न उनसे हो जाए सामना!




Sunday, 26 October 2014

छलका सा कल!

कभी ख़ुशी छलक आती है
कभी ग़म छलक आता है
तुम और मैं में, कभी हम छलक आता है!

कभी बीते लम्हें छलक आते है
कभी भुलाया हुआ पल छलक आता है
अक्सर मेरे आज में, मेरा कल छलक आता है!

रुआंसा दिन छलक आता है
जी जलाती रात छलक आती है
खामोशियों के बीच अक्सर बात छलक आती है!

सब साफ़ साफ़ है फिर भी धुंआ सा,
रवानगी में है फिर भी थमा सा,
अक्सर इन आँखों में क्यों तूफ़ान छलक आता है!

ये क्या है, क्यों है, किसके लिए है,
दिल से उठता हुआ बवाल छलक आता है,
आजकल जवाब की तलाश में बस सवाल छलक आता है!

Friday, 3 October 2014

बक्सा..

एक बड़ा सा बक्सा है,
उसमें ढेर सारा सामान है..
कई सारी यादें है
अनगिनत बातें हैं
कुछ पूरे हुए सपनों की
प्यारी सी मुस्कान है..
हाँ, इस बक्से में ढेर सा सामान है!
कुछ सपने अभी बाकी हैं
कई चाहतें अभी बाकी है
इन्हें भी पूरा कर लूँ
मन की ऐसी भी उड़ान है..
हाँ, इस बक्से में ढेर सा सामान है!
कुछ संभाले हुए फूल हैं
कई पीले पड़े से पन्ने
ज़िन्दगी की फेहरिस्त पे
सूखे हुए आंसुओं के निशान हैं..
हाँ, इस बक्से में ढेर सा सामान है!
जब जी चाहता है इसे खोल लेती हूँ
जो गुज़र गए लम्हें उन्हें फिर से जीती हूँ
कुछ धुंधले से पड़ गए जो
मेरे ही लफ्ज़ हैं मेरी ही ज़ुबान है
हाँ, इस बक्से में मेरा ढेर सा सामान है!