Sunday, 26 October 2014

छलका सा कल!

कभी ख़ुशी छलक आती है
कभी ग़म छलक आता है
तुम और मैं में, कभी हम छलक आता है!

कभी बीते लम्हें छलक आते है
कभी भुलाया हुआ पल छलक आता है
अक्सर मेरे आज में, मेरा कल छलक आता है!

रुआंसा दिन छलक आता है
जी जलाती रात छलक आती है
खामोशियों के बीच अक्सर बात छलक आती है!

सब साफ़ साफ़ है फिर भी धुंआ सा,
रवानगी में है फिर भी थमा सा,
अक्सर इन आँखों में क्यों तूफ़ान छलक आता है!

ये क्या है, क्यों है, किसके लिए है,
दिल से उठता हुआ बवाल छलक आता है,
आजकल जवाब की तलाश में बस सवाल छलक आता है!

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