Sunday, 16 July 2017

मलमल..

तह लगा के रखीं हैं बेहद क़रीने से 
तेरी यादें हैं महकती हुई
खनकती हुई तेरी बातें हैं
झीनी सी रोशनी है 
हल्के से अंधेरे हैं 
जिनकी सुबह ना हुई वो रातें हैं 
ये मलमल का टुकड़ा बचा है अब 
मेरे हिस्से 
एक बीती हुई ज़िंदगी का 
आख़री सलाम हो जैसे 
बुझी हुई राख में एकाध चिंगारी सा तेरा नाम हो जैसे ! 

Thursday, 22 June 2017

मैं, ज़िंदा

मैं क्या था 
एक अधबुना सा ख़्वाब
गमले में खिला 
अधूरा गुलाब 
हवा में तैरता 
एक हल्का अहसास 
हौले से बुझ जाए 
वो आस 
मिट्टी में सना 
एक पत्ता 
ख़ुशबू में ढला, अलबत्ता 
बीता हुआ पल
भूला हुआ कल 
बुझी हुयी सी राख में 
धीमी सी चमक 
रुके हुए क़दमों की 
हल्की सी धमक 
जैसे पंख पसारे
थका हुआ परिंदा 
फिर एक दिन 
तू ने देखा 
रोका 
थामा
छू लिया 
पी लिया 
जी लिया मुझे
और कर दिया 
फिर से 
ज़िंदा !


Tuesday, 20 June 2017

तुम या फाँस

जैसे कच्ची लकड़ी की छोटी सी
नन्ही सी फाँस
हथेली में फँसी रह जाए,
 ना महसूस हो ना पता लगे ना नज़र आए,
पर फिर भी रह रह के दिल दुखाए,
कुछ ऐसे ही...
ज़िंदगी में तुम थे या तुम में ज़िंदगी थी
क्यूँ फिर लौट लौट के
यही सवाल सताए !

धूप

तमाम रात रो रो के गुज़ारी ऐसे
आस्माँ से बर्फ़ के फ़ाहे गिरे हों जैसे
दिल छला भी जला भी दुखा भी
फिर तेरी याद ने मरहम का सा काम किया
कुछ टूटा छन्न से फिर जुड़ भी गया
तेरा ख़याल वो दरख़्तों की छांव सा
जहाँ बैठ पनाह ली,
तेरा नाम लिया
मेरी जीत मेरी हार के तमाम क़िस्से
और वो कहानी जिस में रात घुल जाए
पर अब मन में आता है
के एक सार हो के जी लूँ मैं
बस अब ख़ुद की ही हो लूँ मैं
और रहे तसल्ली यही दिल को
के कितनी भी हो बर्फ़ जमी
ये धूप का टुकड़ा मेरा है,
ये धूप का टुकड़ा
मेरा है !!

Sunday, 28 May 2017

कुछ तो अच्छा है ..

आजकल ज़्यादा वक़्त घर में गुज़रता  है..
 बाहर निकलना बंद सा है 
कमरे की चार दीवारी से दोस्ती हो गयी है 
मन का मौसम कुछ मंद सा है 
बाथरूम की अधखुली खिड़की से 
एक चौथाई सा पेड़ दिखता है
उस पर लगे गुलमोहर के गुच्छे
आज भी अच्छे लगते हैं ..
अब भीड़ अच्छी नहीं लगती 
कुछ लोग अब पसंद नहीं आते 
कुछ बातें चुभती सी लगती हैं 
कुछ बहाने अब नहीं भाते
कई अनजान चेहरे अब 
दोस्त बन गए हैं 
घर आते हैं गले लगाते हैं 
हाल पूछ के दिल का 
मलाल मिटाते हैं 
वो कहते हैं ना हर बात में
कोई अच्छाई छिपी होती है 
शायद इसे ही कहते हैं 
बुरे वक़्त में ऐसे ही तो 
अच्छे की परख होती है 
कुछ तो अच्छा है 
मेरे दर्द और तकलीफ़ में भी 
यही मान कर मैं ख़ुद को 
मना लेती हूँ
अपने आप से फिर ख़ुद को 
मिला लेती हूँ ! 




Sunday, 21 May 2017

आना जाना ..

यादों के गहरे जंगल में 
यूँ आना जाना लगता है 
पीले पड़ गए पत्तों से 
अब भी याराना लगता है 
सूखी डाली क्यूँ करती है 
अब भी मुझ से सवाल कई 
वो हवा के संग उड़ा था जो
मैं ढूँढ रही अब भी उसको
अनजान है अब मालूम तो है 
फिर भी पहचाना लगता है 
क्यूँ डर है अब भी आँखों में 
क्यूँ ख़्वाब पुराना लगता है 
ये दिल अब भी नादान रहा 
बस जिस्म सयाना लगता है 
यादों के गहरे जंगल में 
यूँ आना जाना लगता है 
पीले पड़ गए पत्तों से 
अब भी याराना लगता है !!

Thursday, 6 April 2017

अब अलग सी है ज़िंदगी ...

रास्ते मेरे,
 हैं पड़ाव भी मेरे 
अपनी रफ़्तार ख़ुद चुन के 
बना लिया है इनको अपना 
अब नहीं थकते ये 
नंगे पाँव मेरे ! 
मिल जाती है जब भी चाहूँ 
छांव घनी 
धूप भी सहेज लेती हूँ 
इन आँखों में
सपनो का सा काम करते है 
वो लफ़्ज़ 
जो सुन नहीं पायी 
वो भी 
जो कह नहीं पायी
पर अब कोई उलझन नहीं 
क्यूँकि
अब हैं रास्ते मेरे,
 और ये पड़ाव भी मेरे !


Monday, 9 January 2017

ठंडी चाय

रोज़ किसी कोने में पड़ी 
अपनी किस्मत को रो रही होती है.. 
मेरी सुबह की चाय अक्सर 
ठंडी हो रही होती है!

अजब भगदड़ मची रहती है 
बच्चों का स्कूल - कॉलेज, 
अपने भी काम की जल्दी 
कभी ये उठा कभी उसे रख 
किसी तरह सब निपट जाए और 
समय रहते घर से निकल लूँ 
बस इसी फ़िराक में मेरी नींद उड़ी होती है !
सुबह की चाय अक्सर...

टिफ़िन, पानी, दुपट्टा और पर्स, 
दिन भर की ज़रुरत लायक छुट्टे पैसे 
इतना भी समेट लूँ तो बहुत है 
ये टाइम भी काट लूँ,
बस आज भर और निकाल दूं 
इसी सोच में 
कहीं मेरी तसल्ली पड़ी होती है 
सुबह की चाय अक्सर...

Saturday, 7 January 2017

मेरी लाल बिंदी









वो लाल बिंदी अब अक्सर
पुरानी तस्वीरों में नज़र आती है ,
अब उसे माथे पे लगाने को
जी नहीं करता
फिर सिन्दूर उठाने को जी नहीं करता
फिर देर तक गोल गोल कर
ऊँगली से लगाने को
जी नहीं करता !

अब वो गोंद वाली बिंदी भी
कागज़ के पत्ते पे चिपकी रहती है
दिखती है मुझे रोज़ ही
अपने बिस्तर के आस पास
और हाँ
अक्सर लगी हुयी
आईने पे नज़र आती है
उसे वहां से उतार फेंकने को भी
जी नहीं करता !

वो अपनी जगह है , मैं अपनी जगह हूँ
वहां वो सही है , यहाँ मैं सही हूँ
न वो मानती है , न मैं मानती हूँ
सिर्फ माथे से नहीं
बल्कि मन से उतर गयी है
मुझे अब उसकी ज़रुरत नहीं है 
उसे फिर सजाने को 
जी नहीं करता !