Sunday, 16 July 2017

मलमल..

तह लगा के रखीं हैं बेहद क़रीने से 
तेरी यादें हैं महकती हुई
खनकती हुई तेरी बातें हैं
झीनी सी रोशनी है 
हल्के से अंधेरे हैं 
जिनकी सुबह ना हुई वो रातें हैं 
ये मलमल का टुकड़ा बचा है अब 
मेरे हिस्से 
एक बीती हुई ज़िंदगी का 
आख़री सलाम हो जैसे 
बुझी हुई राख में एकाध चिंगारी सा तेरा नाम हो जैसे ! 

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