अब आवाज़ नहीं होती
पहले की तरह
चीख़ चिल्लाहट नहीं होती
दिल में तूफ़ान नहीं उठते
आँखों में पानी के सैलाब
नहीं उमड़ते
तकिया मेरा सूखा ही रहता है
अब एक चैन भरी
ख़ामोशी है
कोई ज़िद कोई ग़ुस्सा
कोई अफ़सोस नहीं होता
अब मैं नाराज़ नहीं होती
क्यूँकि
अब कोई आवाज़ नहीं होती
ना मेरे अंदर ना बाहर ।