Wednesday, 8 August 2018

चुप सी लगी है

अब आवाज़ नहीं होती 
पहले की तरह 
चीख़ चिल्लाहट नहीं होती 
दिल में तूफ़ान नहीं उठते
आँखों में पानी के सैलाब 
नहीं उमड़ते 
तकिया मेरा सूखा ही रहता है 
अब एक चैन भरी
ख़ामोशी है 
कोई ज़िद कोई ग़ुस्सा 
कोई अफ़सोस नहीं होता 
अब मैं नाराज़ नहीं होती
क्यूँकि
अब कोई आवाज़ नहीं होती
ना मेरे अंदर ना बाहर । 

Tuesday, 10 July 2018

अब नहीं !

मुझे अब तुम्हारी आवाज़
सुनाई नहीं देती..
तस्वीर सामने है फिर भी
दिखाई नहीं देती।
अब तुम्हारे क़दमों की आहट का
गुमां सा भी नहीं होता,
ना तुम्हारी कमी से
आँखें नम होती हैं ..
कई दिन से यही ख़याल
आ रहा है मुझे
शायद कुछ इसी तरह रूह से
मुहब्बत ख़त्म होती है ! 

Thursday, 8 March 2018

अब बस मैं !

मैं अठखेलती नदी सी
मैं ही शांत झील भी
कभी मैं ठंडी मीठी चाँदनी
मैं झुलसाती दोपहरी भी
मुझ में ही बसी है वीरानी
मेले रमे मुझ में ही
कभी तरल पिघलती हुयी
बर्फ़ भी जमे मुझ में ही
मेरे क़दमों की आहट है
रुकी हुयी कहानी में
मेरे दिल की धड़कन है
आग की रवानी में ।
अब कोई तलाश नहीं बाक़ी
अब मैं ही हूँ ...मेरा वजूद ! ❤️