Friday, 24 January 2014

बार बार..

बार बार बिखरते हैं फिर समेट लेती हूँ..
जाने क्यूँ इन आंसुओं को मोती समझ लेती हूँ I 
बार बार रुकते हैं फिर बढ़ा लेती हूँ.. 
कदम अब थक गए हैं क्यूँ मान नहीं लेती हूँ I 
बार बार गिरती हूँ फिर गिर के संभल जाती हूँ.. 
थमना चाहती हूँ पर खुद को रोक नहीं पाती हूँ I 
बार बार छूटता है आस का दामन मुझ से..
फिर बढ़ा के हाथ उसे पास खींच लाती हूँ I 
बार बार कोसती हूँ इन बुझे अंगारों को..
फिर हवा देके इन्हे हर बार जला देती हूँ I
बार बार मरती हूँ मानो दम सा घुटने लगता हो..
फिर याद करके ज़िन्दगी को खुद को मना लेती हूँ!!