Sunday, 28 May 2017

कुछ तो अच्छा है ..

आजकल ज़्यादा वक़्त घर में गुज़रता  है..
 बाहर निकलना बंद सा है 
कमरे की चार दीवारी से दोस्ती हो गयी है 
मन का मौसम कुछ मंद सा है 
बाथरूम की अधखुली खिड़की से 
एक चौथाई सा पेड़ दिखता है
उस पर लगे गुलमोहर के गुच्छे
आज भी अच्छे लगते हैं ..
अब भीड़ अच्छी नहीं लगती 
कुछ लोग अब पसंद नहीं आते 
कुछ बातें चुभती सी लगती हैं 
कुछ बहाने अब नहीं भाते
कई अनजान चेहरे अब 
दोस्त बन गए हैं 
घर आते हैं गले लगाते हैं 
हाल पूछ के दिल का 
मलाल मिटाते हैं 
वो कहते हैं ना हर बात में
कोई अच्छाई छिपी होती है 
शायद इसे ही कहते हैं 
बुरे वक़्त में ऐसे ही तो 
अच्छे की परख होती है 
कुछ तो अच्छा है 
मेरे दर्द और तकलीफ़ में भी 
यही मान कर मैं ख़ुद को 
मना लेती हूँ
अपने आप से फिर ख़ुद को 
मिला लेती हूँ ! 




Sunday, 21 May 2017

आना जाना ..

यादों के गहरे जंगल में 
यूँ आना जाना लगता है 
पीले पड़ गए पत्तों से 
अब भी याराना लगता है 
सूखी डाली क्यूँ करती है 
अब भी मुझ से सवाल कई 
वो हवा के संग उड़ा था जो
मैं ढूँढ रही अब भी उसको
अनजान है अब मालूम तो है 
फिर भी पहचाना लगता है 
क्यूँ डर है अब भी आँखों में 
क्यूँ ख़्वाब पुराना लगता है 
ये दिल अब भी नादान रहा 
बस जिस्म सयाना लगता है 
यादों के गहरे जंगल में 
यूँ आना जाना लगता है 
पीले पड़ गए पत्तों से 
अब भी याराना लगता है !!