Sunday, 21 May 2017

आना जाना ..

यादों के गहरे जंगल में 
यूँ आना जाना लगता है 
पीले पड़ गए पत्तों से 
अब भी याराना लगता है 
सूखी डाली क्यूँ करती है 
अब भी मुझ से सवाल कई 
वो हवा के संग उड़ा था जो
मैं ढूँढ रही अब भी उसको
अनजान है अब मालूम तो है 
फिर भी पहचाना लगता है 
क्यूँ डर है अब भी आँखों में 
क्यूँ ख़्वाब पुराना लगता है 
ये दिल अब भी नादान रहा 
बस जिस्म सयाना लगता है 
यादों के गहरे जंगल में 
यूँ आना जाना लगता है 
पीले पड़ गए पत्तों से 
अब भी याराना लगता है !!

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