Saturday, 17 September 2016

आदत है या मैं हूँ..

पुराने सामान को  संभाल रखना 
पुरानी आदत है,
इस आदत से परेशान रहना भी 
पुरानी आदत है..
यहाँ से उठा कर वहाँ रख देती हूँ,
फिर उधर भी बुरा लगता है 
तो खीज जाती हूँ 
कहीं छुपा के रख दूँ, 
नज़र ना पड़ने पाए 
इस ख़याल से परेशान रहना 
पुरानी आदत है..
कभी सोचती हूँ 
यूँ ही फेंक दूँ इसको 
या दे दूँ किसी को, कोई ले जाए 
फिर उठा के किसी कोने में 
डाल देती हूँ ..
पुराना हुआ तो क्या, कभी
काम आएगा 
इस पुरानी सोच से परेशान रहना
पुरानी आदत है.. 
सामान से परेशान हूँ या 
ख़ुद से हूँ 
जवाब है फिर भी 
सवाल ढूँढती हूँ 
जो दिख रहा है मानती क्यूँ नहीं
परेशान रहना..
आदत बना डाली है 
क्या कहूँ किस से कहूँ 
के अब हर वक़्त 
इस आदत से परेशान रहती हूँ .. 
ये  भी ख्याल आता है मन में 
के इस परेशानी की वजह क्या है 
पुराना सामान है, 
आदत है या
सिर्फ मैं हूँ ...


Tuesday, 13 September 2016

करना पड़ता है!

तुम सुनी-सुनाई बात पे
गौर न करना
लोग बस यूँ ही कभी
कुछ भी कहा करते हैं
तुम तो पढ़ लेना
मेरी हाथ की रेखाओं को
जान लेना की
तितलियों की तरह
सीख लिया है हर मौसम में
रंग भरना मैंने..
और सीखा है
जुगनुओं की तरह
हर अँधेरे को रोशन करना मैंने !
करना पड़ता है ये सब
अपने लिए
अपनों के लिए
और अपने ही सपनो के लिए
करना पड़ता है!


जी ले ज़रा..

अँधेरी रात के ढलने का समय हो चला है
मुझे फिर जगाने वो भोर आ गयी
शिकायत की चादर की सिलवट समेटूं
और फिर से सजा लूँ मैं अपने ही मन को
के हाथों में फिर मेरे डोर आ गयी है !