Monday, 9 January 2017

ठंडी चाय

रोज़ किसी कोने में पड़ी 
अपनी किस्मत को रो रही होती है.. 
मेरी सुबह की चाय अक्सर 
ठंडी हो रही होती है!

अजब भगदड़ मची रहती है 
बच्चों का स्कूल - कॉलेज, 
अपने भी काम की जल्दी 
कभी ये उठा कभी उसे रख 
किसी तरह सब निपट जाए और 
समय रहते घर से निकल लूँ 
बस इसी फ़िराक में मेरी नींद उड़ी होती है !
सुबह की चाय अक्सर...

टिफ़िन, पानी, दुपट्टा और पर्स, 
दिन भर की ज़रुरत लायक छुट्टे पैसे 
इतना भी समेट लूँ तो बहुत है 
ये टाइम भी काट लूँ,
बस आज भर और निकाल दूं 
इसी सोच में 
कहीं मेरी तसल्ली पड़ी होती है 
सुबह की चाय अक्सर...

Saturday, 7 January 2017

मेरी लाल बिंदी









वो लाल बिंदी अब अक्सर
पुरानी तस्वीरों में नज़र आती है ,
अब उसे माथे पे लगाने को
जी नहीं करता
फिर सिन्दूर उठाने को जी नहीं करता
फिर देर तक गोल गोल कर
ऊँगली से लगाने को
जी नहीं करता !

अब वो गोंद वाली बिंदी भी
कागज़ के पत्ते पे चिपकी रहती है
दिखती है मुझे रोज़ ही
अपने बिस्तर के आस पास
और हाँ
अक्सर लगी हुयी
आईने पे नज़र आती है
उसे वहां से उतार फेंकने को भी
जी नहीं करता !

वो अपनी जगह है , मैं अपनी जगह हूँ
वहां वो सही है , यहाँ मैं सही हूँ
न वो मानती है , न मैं मानती हूँ
सिर्फ माथे से नहीं
बल्कि मन से उतर गयी है
मुझे अब उसकी ज़रुरत नहीं है 
उसे फिर सजाने को 
जी नहीं करता !