वो लाल बिंदी अब अक्सर
पुरानी तस्वीरों में नज़र आती है ,
अब उसे माथे पे लगाने को
जी नहीं करता
फिर सिन्दूर उठाने को जी नहीं करता
फिर देर तक गोल गोल कर
ऊँगली से लगाने को
जी नहीं करता !
अब वो गोंद वाली बिंदी भी
कागज़ के पत्ते पे चिपकी रहती है
दिखती है मुझे रोज़ ही
अपने बिस्तर के आस पास
और हाँ
अक्सर लगी हुयी
आईने पे नज़र आती है
उसे वहां से उतार फेंकने को भी
जी नहीं करता !
वो अपनी जगह है , मैं अपनी जगह हूँ
वहां वो सही है , यहाँ मैं सही हूँ
न वो मानती है , न मैं मानती हूँ
सिर्फ माथे से नहीं
बल्कि मन से उतर गयी है
मुझे अब उसकी ज़रुरत नहीं है
उसे फिर सजाने को
जी नहीं करता !

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