Thursday, 22 June 2017

मैं, ज़िंदा

मैं क्या था 
एक अधबुना सा ख़्वाब
गमले में खिला 
अधूरा गुलाब 
हवा में तैरता 
एक हल्का अहसास 
हौले से बुझ जाए 
वो आस 
मिट्टी में सना 
एक पत्ता 
ख़ुशबू में ढला, अलबत्ता 
बीता हुआ पल
भूला हुआ कल 
बुझी हुयी सी राख में 
धीमी सी चमक 
रुके हुए क़दमों की 
हल्की सी धमक 
जैसे पंख पसारे
थका हुआ परिंदा 
फिर एक दिन 
तू ने देखा 
रोका 
थामा
छू लिया 
पी लिया 
जी लिया मुझे
और कर दिया 
फिर से 
ज़िंदा !


Tuesday, 20 June 2017

तुम या फाँस

जैसे कच्ची लकड़ी की छोटी सी
नन्ही सी फाँस
हथेली में फँसी रह जाए,
 ना महसूस हो ना पता लगे ना नज़र आए,
पर फिर भी रह रह के दिल दुखाए,
कुछ ऐसे ही...
ज़िंदगी में तुम थे या तुम में ज़िंदगी थी
क्यूँ फिर लौट लौट के
यही सवाल सताए !

धूप

तमाम रात रो रो के गुज़ारी ऐसे
आस्माँ से बर्फ़ के फ़ाहे गिरे हों जैसे
दिल छला भी जला भी दुखा भी
फिर तेरी याद ने मरहम का सा काम किया
कुछ टूटा छन्न से फिर जुड़ भी गया
तेरा ख़याल वो दरख़्तों की छांव सा
जहाँ बैठ पनाह ली,
तेरा नाम लिया
मेरी जीत मेरी हार के तमाम क़िस्से
और वो कहानी जिस में रात घुल जाए
पर अब मन में आता है
के एक सार हो के जी लूँ मैं
बस अब ख़ुद की ही हो लूँ मैं
और रहे तसल्ली यही दिल को
के कितनी भी हो बर्फ़ जमी
ये धूप का टुकड़ा मेरा है,
ये धूप का टुकड़ा
मेरा है !!