मैं क्या था
एक अधबुना सा ख़्वाब
गमले में खिला
अधूरा गुलाब
हवा में तैरता
एक हल्का अहसास
हौले से बुझ जाए
वो आस
मिट्टी में सना
एक पत्ता
ख़ुशबू में ढला, अलबत्ता
बीता हुआ पल
भूला हुआ कल
बुझी हुयी सी राख में
धीमी सी चमक
रुके हुए क़दमों की
हल्की सी धमक
जैसे पंख पसारे
थका हुआ परिंदा
फिर एक दिन
तू ने देखा
रोका
थामा
छू लिया
पी लिया
जी लिया मुझे
और कर दिया
फिर से
ज़िंदा !