Wednesday, 8 August 2018

चुप सी लगी है

अब आवाज़ नहीं होती 
पहले की तरह 
चीख़ चिल्लाहट नहीं होती 
दिल में तूफ़ान नहीं उठते
आँखों में पानी के सैलाब 
नहीं उमड़ते 
तकिया मेरा सूखा ही रहता है 
अब एक चैन भरी
ख़ामोशी है 
कोई ज़िद कोई ग़ुस्सा 
कोई अफ़सोस नहीं होता 
अब मैं नाराज़ नहीं होती
क्यूँकि
अब कोई आवाज़ नहीं होती
ना मेरे अंदर ना बाहर ।