Thursday, 25 July 2019

बारिश और मैं ..

गहरी नींद में थी 
अचानक कमरा बर्फ़ सा ठंडा लगा,
सिहरन हुई तो चादर और कसके लपेट ली 
फिर पड़ी कान में वो आवाज़ 
जो मेरी नींद और सपने को पार कर 
मुझे जगा गयी 
ताबड़तोड़ बारिश की आवाज़ 
मैं उठी
सब खिड़की दरवाज़े खोले
हवा और पानी को मेहमान की तरह 
अंदर बुलाया 
गीली मिट्टी की ख़ुशबू से 
घर को महकाया 
चाय बनायी 
और आराम से पीने बैठ गयी
तड़ तड़ गिरते पानी को निहारते हुए
भूल सी गयी कुछ पलों के लिए 
मन का भारीपन 
कुछ रिश्तों में हम बँधे रहना चाहते हैं 
हर बार और कस के गाँठ लगाना चाहते हैं 
ऐसा ही है 
मेरा और बारिश का रिश्ता 
बारिश और चाय का रिश्ता 
चाय और सुकून का रिश्ता 
बस बंधी रहूँ यूँ ही
तुम बरसती रहो यूँ ही 
मैं भीगती रहो यूँ ही I

Monday, 22 July 2019

घर मेहमान, खाली मकान I

बचपन में अक्सर घर में मेहमान आते थे
दूर दूर से, गांव से छोटे शहरों से
हम दिल्ली जैसे महानगर में रहते थे
बड़ा सा तिमंज़िला घर था
सो
कभी इलाज के लिए
बच्चों के पढ़ाई या किसी इम्तिहान के लिए
या बेटियों की ससुराल परखने
किसी न किसी का आना जाना लगा रहता था
अच्छा लगता था
दूर पास के ताऊजी ताईजी,
कभी कोई बुआ या मौसी या मामा
और कई बार तो उनके भी दोस्त, यार, जानने वाले तक
बेझिझक आ के रह जाया करते थे
दो दिन हों या चार
घर की रौनक बढ़ ही जाती थी
खाना सादा ही बनता था बस थोड़ा ज़्यादा बनता था
और कभी कभी एक-आध पकवान बढ़ जाता था
पहाड़ से आने वाले मेहमान हमेशा ही
बाल मिठाई या चॉक्लेट बर्फी ले के आते थे
और मैदानी इलाकों के मेहमान
वहां की खास नमकीन या मीठा
खाली हाथ कभी कोई नहीं आया
और बहुत खर्चीला सामान भी नहीं लाया
छोटे छोटे से पल होते थे
छोटी छोटी सी खुशियां
घर में सब मिल बाँट के काम करते थे
बड़े लोग ऊपर बेड या चारपाई पर सोते थे
और हम सब बच्चे ज़मीन पर गद्दे डाल कर
इस में कोई बहस की गुंजाईश नहीं थी
जितने दिन साथ रहते थे मज़े में कटते थे
कभी कभी उन मेहमानों के संग बाहर जाने का सुख मिलता था
आइस क्रीम, या चाट का सौभाग्य भी
हम बच्चों की यही उम्मीद रहती थी के जब वो जाएं हम घर पर ही हों
जाते जाते हाथ में दो -पांच रुपये अपनी हैसियत के अनुसार पकड़ा जो जाते थे
हमारे लिए ख़ज़ाने जैसे
कई कई दिन का खर्चा निकल जाता था
कितने सरल दिन थे कितनी आसान रातें
आज शहरों के खालीपन में कहाँ वो बातें
अब कोई किसी के घर नहीं आता
आता भी है तो रात नहीं रुकता
कितना भी करीबी रिश्ता हो
लोग होटल में कमरा ले के रहते हैं
कहते हैं सबको आराम रहेगा
अरे काहे का आराम
अकेलेपन में तो हम सभी जीते हैं
आओ कभी एक दूसरे के साथ रहें
वक़्त तो हम काट ही रहे हैं
आओ कभी ये ज़िन्दगी भी जियें
नहीं ??!


Friday, 19 July 2019

बताओ!!

मैंने जो कहा
उसने वो सुना नहीं
उसने जो सुना
ठीक से समझा नहीं
जो समझा 
वो किया नहीं
जो किया
उसे सोचा नहीं,
फिर मुझे ही कहा
के मैंने रोका नहीं
क्यूँ वक़्त रहते
टोका नहीं
क्यूँ ठीक से कहा नहीं
तभी ना
उसने सही से सुना नहीं
समझा नहीं
सोचा नहीं
किया नहीं।
बताओ!!

Thursday, 18 July 2019

गलती तुम्हारी ज़्यादा थी !

तुमने पूरब कहा
मैंने पश्चिम
कभी एक सुर में नहीं रहे
मैंने ताव में हाथ झटक दिया तुम्हारा
तुमने दोबारा थामने की कोशिश नहीं की
मैं लगी सामान बाँधने
तुमने रोकने की कोशिश नहीं की
मैं उस घर के दरवाज़े बाहर से खींच के बंद कर आयी थी
तुमने भींच के अंदर से कुण्डी लगा ली
मैंने अपने दिल में अधखुली खिड़की न छोड़ी
तुम ने भी अपने दिल में दीवार खड़ी कर ली
मैं गिरती रही घुटने छलनी कर लिए
तुमने कभी मलहम न पूछा
मैं भूख से लड़ रही थी
तुम थाल सजा के बैठे रहे
मैंने उन रास्तों पे मुड़ के भी न देखा
तुम तब तक दूसरी दिशा में चल भी पड़े
मैंने जान बूझ के अनसुनी किया जिसे
तुमने कभी वो आवाज़ दी ही नहीं
मेरा अच्छा किया तुम्हें कभी दिखा ही नहीं
मेरी बुराई तुमने सौ जगह कर दीं
हाँ मैं चली आयी घर से
पर तुमने मुझे ढूंढ़ने की
कोशिश भी न की
मेरा गुस्सा और तुम्हारी नाराज़गी
एक दूसरे से एक कदम आगे
मेरा तुम्हारा कोई मुकाबला था भला
तुम पिता थे मैं तुम्हारी बच्ची
मेरे अच्छे बुरे के ज़िम्मेदार थे तुम
माना मैं बुरी थी पर तुम भी अच्छे न हुए
शर्तों पे मेरा ध्यान करने की शर्त
मुझे कभी रास नहीं आयी
तुमसे कुछ और तो न पाया मैंने
गुस्सा, ज़िद और कड़वाहट के सिवा
उम्र के इस पड़ाव पर आ कर
जहाँ तुम कभी भी
दुनिया से विदा लेने तो तैयार बैठे हो
मैं भी हर दिन चेहरे की झुर्रियां और
सफ़ेद होते बाल गिन रही हूँ
क्या तुम्हें अब भी ये ख्याल नहीं आता
के
जो मेरा हक़ था वो तुम्हारा फ़र्ज़
और
हम दोनों ही विफल रहे पर
गलती तुम्हारी ज़्यादा थी ! 

सुराख़

एक मर्ज़ हो गया है
दिल को शायद 
सुराख़ हो गया है
दिल में
कुछ रिस रहा है
बेसाख़्ता वहाँ से
रुक नहीं रहा हो
कुछ भी जैसे
बह रहीं हैं
तकलीफ़देह यादें
छूट रहीं हैं 
चीख़ और टीसें
तेज़ बहाव है
दर्द का
तेज़ी से 
ख़ाली हो रहा है दिल
साथ ही मिल रही है
मुक्ति तनाव से
उलझन से
शांत हो रही है जलन
निकल रही है चुभन
इस सुराख़ से 
जाने क्यूँ लोग 
इस सुराख़ से डरते हैं 
इसे मर्ज़ कहते हैं 
मैं तो कहती हूँ
हर दिल में ये 
सुराख़ होना चाहिए
बह जाए जहाँ से 
हर अनचाही पीड़ा
हर बिन माँगी तकलीफ़ 
और हर वो बेबात का दर्द
जिसे हम पाले घूमते हैं
दिल को भरते हैं
भारी करते हैं
और एक रोज़ इसी भार से 
बेवक़्त मरते हैं !