बचपन में अक्सर घर में मेहमान आते थे
दूर दूर से, गांव से छोटे शहरों से
हम दिल्ली जैसे महानगर में रहते थे
बड़ा सा तिमंज़िला घर था
सो
कभी इलाज के लिए
बच्चों के पढ़ाई या किसी इम्तिहान के लिए
या बेटियों की ससुराल परखने
किसी न किसी का आना जाना लगा रहता था
अच्छा लगता था
दूर पास के ताऊजी ताईजी,
कभी कोई बुआ या मौसी या मामा
और कई बार तो उनके भी दोस्त, यार, जानने वाले तक
बेझिझक आ के रह जाया करते थे
दो दिन हों या चार
घर की रौनक बढ़ ही जाती थी
खाना सादा ही बनता था बस थोड़ा ज़्यादा बनता था
और कभी कभी एक-आध पकवान बढ़ जाता था
पहाड़ से आने वाले मेहमान हमेशा ही
बाल मिठाई या चॉक्लेट बर्फी ले के आते थे
और मैदानी इलाकों के मेहमान
वहां की खास नमकीन या मीठा
खाली हाथ कभी कोई नहीं आया
और बहुत खर्चीला सामान भी नहीं लाया
छोटे छोटे से पल होते थे
छोटी छोटी सी खुशियां
घर में सब मिल बाँट के काम करते थे
बड़े लोग ऊपर बेड या चारपाई पर सोते थे
और हम सब बच्चे ज़मीन पर गद्दे डाल कर
इस में कोई बहस की गुंजाईश नहीं थी
जितने दिन साथ रहते थे मज़े में कटते थे
कभी कभी उन मेहमानों के संग बाहर जाने का सुख मिलता था
आइस क्रीम, या चाट का सौभाग्य भी
हम बच्चों की यही उम्मीद रहती थी के जब वो जाएं हम घर पर ही हों
जाते जाते हाथ में दो -पांच रुपये अपनी हैसियत के अनुसार पकड़ा जो जाते थे
हमारे लिए ख़ज़ाने जैसे
कई कई दिन का खर्चा निकल जाता था
कितने सरल दिन थे कितनी आसान रातें
आज शहरों के खालीपन में कहाँ वो बातें
अब कोई किसी के घर नहीं आता
आता भी है तो रात नहीं रुकता
कितना भी करीबी रिश्ता हो
लोग होटल में कमरा ले के रहते हैं
कहते हैं सबको आराम रहेगा
अरे काहे का आराम
अकेलेपन में तो हम सभी जीते हैं
आओ कभी एक दूसरे के साथ रहें
वक़्त तो हम काट ही रहे हैं
आओ कभी ये ज़िन्दगी भी जियें
नहीं ??!
दूर दूर से, गांव से छोटे शहरों से
हम दिल्ली जैसे महानगर में रहते थे
बड़ा सा तिमंज़िला घर था
सो
कभी इलाज के लिए
बच्चों के पढ़ाई या किसी इम्तिहान के लिए
या बेटियों की ससुराल परखने
किसी न किसी का आना जाना लगा रहता था
अच्छा लगता था
दूर पास के ताऊजी ताईजी,
कभी कोई बुआ या मौसी या मामा
और कई बार तो उनके भी दोस्त, यार, जानने वाले तक
बेझिझक आ के रह जाया करते थे
दो दिन हों या चार
घर की रौनक बढ़ ही जाती थी
खाना सादा ही बनता था बस थोड़ा ज़्यादा बनता था
और कभी कभी एक-आध पकवान बढ़ जाता था
पहाड़ से आने वाले मेहमान हमेशा ही
बाल मिठाई या चॉक्लेट बर्फी ले के आते थे
और मैदानी इलाकों के मेहमान
वहां की खास नमकीन या मीठा
खाली हाथ कभी कोई नहीं आया
और बहुत खर्चीला सामान भी नहीं लाया
छोटे छोटे से पल होते थे
छोटी छोटी सी खुशियां
घर में सब मिल बाँट के काम करते थे
बड़े लोग ऊपर बेड या चारपाई पर सोते थे
और हम सब बच्चे ज़मीन पर गद्दे डाल कर
इस में कोई बहस की गुंजाईश नहीं थी
जितने दिन साथ रहते थे मज़े में कटते थे
कभी कभी उन मेहमानों के संग बाहर जाने का सुख मिलता था
आइस क्रीम, या चाट का सौभाग्य भी
हम बच्चों की यही उम्मीद रहती थी के जब वो जाएं हम घर पर ही हों
जाते जाते हाथ में दो -पांच रुपये अपनी हैसियत के अनुसार पकड़ा जो जाते थे
हमारे लिए ख़ज़ाने जैसे
कई कई दिन का खर्चा निकल जाता था
कितने सरल दिन थे कितनी आसान रातें
आज शहरों के खालीपन में कहाँ वो बातें
अब कोई किसी के घर नहीं आता
आता भी है तो रात नहीं रुकता
कितना भी करीबी रिश्ता हो
लोग होटल में कमरा ले के रहते हैं
कहते हैं सबको आराम रहेगा
अरे काहे का आराम
अकेलेपन में तो हम सभी जीते हैं
आओ कभी एक दूसरे के साथ रहें
वक़्त तो हम काट ही रहे हैं
आओ कभी ये ज़िन्दगी भी जियें
नहीं ??!
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