Thursday, 18 July 2019

सुराख़

एक मर्ज़ हो गया है
दिल को शायद 
सुराख़ हो गया है
दिल में
कुछ रिस रहा है
बेसाख़्ता वहाँ से
रुक नहीं रहा हो
कुछ भी जैसे
बह रहीं हैं
तकलीफ़देह यादें
छूट रहीं हैं 
चीख़ और टीसें
तेज़ बहाव है
दर्द का
तेज़ी से 
ख़ाली हो रहा है दिल
साथ ही मिल रही है
मुक्ति तनाव से
उलझन से
शांत हो रही है जलन
निकल रही है चुभन
इस सुराख़ से 
जाने क्यूँ लोग 
इस सुराख़ से डरते हैं 
इसे मर्ज़ कहते हैं 
मैं तो कहती हूँ
हर दिल में ये 
सुराख़ होना चाहिए
बह जाए जहाँ से 
हर अनचाही पीड़ा
हर बिन माँगी तकलीफ़ 
और हर वो बेबात का दर्द
जिसे हम पाले घूमते हैं
दिल को भरते हैं
भारी करते हैं
और एक रोज़ इसी भार से 
बेवक़्त मरते हैं ! 

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