Thursday, 25 July 2019

बारिश और मैं ..

गहरी नींद में थी 
अचानक कमरा बर्फ़ सा ठंडा लगा,
सिहरन हुई तो चादर और कसके लपेट ली 
फिर पड़ी कान में वो आवाज़ 
जो मेरी नींद और सपने को पार कर 
मुझे जगा गयी 
ताबड़तोड़ बारिश की आवाज़ 
मैं उठी
सब खिड़की दरवाज़े खोले
हवा और पानी को मेहमान की तरह 
अंदर बुलाया 
गीली मिट्टी की ख़ुशबू से 
घर को महकाया 
चाय बनायी 
और आराम से पीने बैठ गयी
तड़ तड़ गिरते पानी को निहारते हुए
भूल सी गयी कुछ पलों के लिए 
मन का भारीपन 
कुछ रिश्तों में हम बँधे रहना चाहते हैं 
हर बार और कस के गाँठ लगाना चाहते हैं 
ऐसा ही है 
मेरा और बारिश का रिश्ता 
बारिश और चाय का रिश्ता 
चाय और सुकून का रिश्ता 
बस बंधी रहूँ यूँ ही
तुम बरसती रहो यूँ ही 
मैं भीगती रहो यूँ ही I

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