क्या ख़ाली सा दिखता है तुमको मकाँ मेरा
और भरी भरी सी आँखें
अरे नहीं, ज़रा रुको, ग़ौर करो
मेरे अंदर भरे हैं मनों ठहाके
बेबात की हज़ारों बातें
तुम्हारे साथ
ज़ोर ज़ोर से गाए हुए बेसुरे गीत
बीती हुई मुहब्बत की तमाम यादें
एहसास जो रखें हैं ज़िंदा मुझको
रसोई से आती वो नरम ख़ुश्बू
चाय की पत्ती के संग
अदरक उबल रही हो जैसे
सिरहाने रखी किताब के पीले पन्ने
और उन पन्नों में दबा वो फीका गुलाब
बरसात में भीगे पैरों की महक
और चप चप करती चप्पल की आवाज़
कई दिन से बंद पड़े कमरे की सीलन
उस कमरे की मंदी पीली रोशनी
तुम्हारी धुँधली सी हो गयी सफ़ेद क़मीज़ पे
मेरे नीले दुपट्टे का उतरा हुआ रंग
सब समेट रखा है मैंने
फेंका नहीं आज तक कुछ भी..
भरा भरा सा है मन मेरा
कभी छलक आता है, कभी नहीं!
और भरी भरी सी आँखें
अरे नहीं, ज़रा रुको, ग़ौर करो
मेरे अंदर भरे हैं मनों ठहाके
बेबात की हज़ारों बातें
तुम्हारे साथ
ज़ोर ज़ोर से गाए हुए बेसुरे गीत
बीती हुई मुहब्बत की तमाम यादें
एहसास जो रखें हैं ज़िंदा मुझको
रसोई से आती वो नरम ख़ुश्बू
चाय की पत्ती के संग
अदरक उबल रही हो जैसे
सिरहाने रखी किताब के पीले पन्ने
और उन पन्नों में दबा वो फीका गुलाब
बरसात में भीगे पैरों की महक
और चप चप करती चप्पल की आवाज़
कई दिन से बंद पड़े कमरे की सीलन
उस कमरे की मंदी पीली रोशनी
तुम्हारी धुँधली सी हो गयी सफ़ेद क़मीज़ पे
मेरे नीले दुपट्टे का उतरा हुआ रंग
सब समेट रखा है मैंने
फेंका नहीं आज तक कुछ भी..
भरा भरा सा है मन मेरा
कभी छलक आता है, कभी नहीं!
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