तुमने पूरब कहा
मैंने पश्चिम
कभी एक सुर में नहीं रहे
मैंने ताव में हाथ झटक दिया तुम्हारा
तुमने दोबारा थामने की कोशिश नहीं की
मैं लगी सामान बाँधने
तुमने रोकने की कोशिश नहीं की
मैं उस घर के दरवाज़े बाहर से खींच के बंद कर आयी थी
तुमने भींच के अंदर से कुण्डी लगा ली
मैंने अपने दिल में अधखुली खिड़की न छोड़ी
तुम ने भी अपने दिल में दीवार खड़ी कर ली
मैं गिरती रही घुटने छलनी कर लिए
तुमने कभी मलहम न पूछा
मैं भूख से लड़ रही थी
तुम थाल सजा के बैठे रहे
मैंने उन रास्तों पे मुड़ के भी न देखा
तुम तब तक दूसरी दिशा में चल भी पड़े
मैंने जान बूझ के अनसुनी किया जिसे
तुमने कभी वो आवाज़ दी ही नहीं
मेरा अच्छा किया तुम्हें कभी दिखा ही नहीं
मेरी बुराई तुमने सौ जगह कर दीं
हाँ मैं चली आयी घर से
पर तुमने मुझे ढूंढ़ने की
कोशिश भी न की
मेरा गुस्सा और तुम्हारी नाराज़गी
एक दूसरे से एक कदम आगे
मेरा तुम्हारा कोई मुकाबला था भला
तुम पिता थे मैं तुम्हारी बच्ची
मेरे अच्छे बुरे के ज़िम्मेदार थे तुम
माना मैं बुरी थी पर तुम भी अच्छे न हुए
शर्तों पे मेरा ध्यान करने की शर्त
मुझे कभी रास नहीं आयी
तुमसे कुछ और तो न पाया मैंने
गुस्सा, ज़िद और कड़वाहट के सिवा
उम्र के इस पड़ाव पर आ कर
जहाँ तुम कभी भी
दुनिया से विदा लेने तो तैयार बैठे हो
मैं भी हर दिन चेहरे की झुर्रियां और
सफ़ेद होते बाल गिन रही हूँ
क्या तुम्हें अब भी ये ख्याल नहीं आता
के
जो मेरा हक़ था वो तुम्हारा फ़र्ज़
और
हम दोनों ही विफल रहे पर
गलती तुम्हारी ज़्यादा थी !
मैंने पश्चिम
कभी एक सुर में नहीं रहे
मैंने ताव में हाथ झटक दिया तुम्हारा
तुमने दोबारा थामने की कोशिश नहीं की
मैं लगी सामान बाँधने
तुमने रोकने की कोशिश नहीं की
मैं उस घर के दरवाज़े बाहर से खींच के बंद कर आयी थी
तुमने भींच के अंदर से कुण्डी लगा ली
मैंने अपने दिल में अधखुली खिड़की न छोड़ी
तुम ने भी अपने दिल में दीवार खड़ी कर ली
मैं गिरती रही घुटने छलनी कर लिए
तुमने कभी मलहम न पूछा
मैं भूख से लड़ रही थी
तुम थाल सजा के बैठे रहे
मैंने उन रास्तों पे मुड़ के भी न देखा
तुम तब तक दूसरी दिशा में चल भी पड़े
मैंने जान बूझ के अनसुनी किया जिसे
तुमने कभी वो आवाज़ दी ही नहीं
मेरा अच्छा किया तुम्हें कभी दिखा ही नहीं
मेरी बुराई तुमने सौ जगह कर दीं
हाँ मैं चली आयी घर से
पर तुमने मुझे ढूंढ़ने की
कोशिश भी न की
मेरा गुस्सा और तुम्हारी नाराज़गी
एक दूसरे से एक कदम आगे
मेरा तुम्हारा कोई मुकाबला था भला
तुम पिता थे मैं तुम्हारी बच्ची
मेरे अच्छे बुरे के ज़िम्मेदार थे तुम
माना मैं बुरी थी पर तुम भी अच्छे न हुए
शर्तों पे मेरा ध्यान करने की शर्त
मुझे कभी रास नहीं आयी
तुमसे कुछ और तो न पाया मैंने
गुस्सा, ज़िद और कड़वाहट के सिवा
उम्र के इस पड़ाव पर आ कर
जहाँ तुम कभी भी
दुनिया से विदा लेने तो तैयार बैठे हो
मैं भी हर दिन चेहरे की झुर्रियां और
सफ़ेद होते बाल गिन रही हूँ
क्या तुम्हें अब भी ये ख्याल नहीं आता
के
जो मेरा हक़ था वो तुम्हारा फ़र्ज़
और
हम दोनों ही विफल रहे पर
गलती तुम्हारी ज़्यादा थी !
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