Wednesday, 29 May 2019

बस एक आख़री बार !

बस एक आख़री 
अधूरी सी 
याद बची थी  
आज उस से कई काम ले लिए 
आज उसे ही 
बिछोने सा सजा लिया 
सिर के नीचे गोल मोल कर 
सिरहाना बना लिया 
शाम ढले हल्की सिहरन हुई 
तो उसे ही ओढ़ लिया
अँधेरा जो गहराया 
तो उसे ही मोमबत्ती सा जला 
घर का कोना 
रोशन कर लिया 
मन जो ज़रा बोझिल हुआ
तो उसे ही गीत सा 
गुनगुना लिया 
ख़ाली पड़े गुलदान में 
उसे 
गुलाब सा सजा लिया 
अब और करना भी क्या था 
उस एक याद का 
जितने काम आ सकी 
उतना काम ले लिया
वो आख़री अधूरी सी याद 
तुम्हारे नाम की!

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