अँधेरी रात के ढलने का समय हो चला है
मुझे फिर जगाने वो भोर आ गयी
शिकायत की चादर की सिलवट समेटूं
और फिर से सजा लूँ मैं अपने ही मन को
के हाथों में फिर मेरे डोर आ गयी है !
मुझे फिर जगाने वो भोर आ गयी
शिकायत की चादर की सिलवट समेटूं
और फिर से सजा लूँ मैं अपने ही मन को
के हाथों में फिर मेरे डोर आ गयी है !
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