बार बार बिखरते हैं फिर समेट लेती हूँ..जाने क्यूँ इन आंसुओं को मोती समझ लेती हूँ I
बार बार रुकते हैं फिर बढ़ा लेती हूँ..
कदम अब थक गए हैं क्यूँ मान नहीं लेती हूँ I
बार बार गिरती हूँ फिर गिर के संभल जाती हूँ..
थमना चाहती हूँ पर खुद को रोक नहीं पाती हूँ I
बार बार छूटता है आस का दामन मुझ से..
फिर बढ़ा के हाथ उसे पास खींच लाती हूँ I
बार बार कोसती हूँ इन बुझे अंगारों को..
फिर हवा देके इन्हे हर बार जला देती हूँ I
बार बार मरती हूँ मानो दम सा घुटने लगता हो..
फिर याद करके ज़िन्दगी को खुद को मना लेती हूँ!!
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