Wednesday, 29 October 2014

रात की चादर..


झरोखे हैं बंद, ये खिड़की अधखुली,
कैसे किसी की याद से परदे हिले ज़रा
अंधेरो से दिल लगा लिया, दी रौशनी मिटा
अब शाम के ढलने में आने लगा मज़ा!

चुपचाप सी हैं साँसे, खामोश है ज़ुबां
फिर अपने खयालों पे साया हुआ घना
क्या घर की देहरी पे परछाईं  है कोई
दस्तक की तो आज भी आहट नहीं ज़रा!

ये रात की है चादरऔर चाँद का बिछौना
तकिये पे आंसुओं का है दाग भी पड़ा,
बस आँख बंद करने को मन नहीं मेरा
के  ख्वाब में न उनसे हो जाए सामना!




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