कहाँ गए वो चौके-चूल्हे के घर,
वो धुंए से काले हुए बर्तन..
कहाँ गए वो दाल भात के दिन
वो कोयले की राख से सने बर्तन
कहाँ गए वो दाल भात के दिन
वो कोयले की राख से सने बर्तन
अम्मा..
वो तीखी मिर्चें, वो मीठी चटनी,
बस सूखे आलू और पानी की रोटी,
वो खुशबू तेरे छौंक की
वो जादू तेरे हाथ का...
अम्मा..
आज मेरी रसोई चमकदार है..
बर्तनो में कांच की खंकार है,
पर न खाने में वो स्वाद है..
न कामवाली के पकाने में वो प्यार है
अम्मा..
न हवा में तेरी पुकार है
न तेरे बुलावे का इंतज़ार है,
अपनी दुनिया में जी रही हूँ मगर,
मन को आज भी तेरी ही दरकार है
अम्मा!!

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