जहाँ से चल के निकल गए हम,
अपनी ही रफ़्तार में बहुत आगे..
उन्ही मोड़ों पे कहीं फुरसत छिपी बैठी थी
नज़र बढ़ी न उस तरफ,
न कदम थमे,
न देखा रुक के..
अपने दिन भी वहां थे और अपनी रात वहीँ बैठी थी!
जो दिल की आवाज़ पे ज़रा ठहरे होते
वही मिल जाती दबी हुई हंसी तुमको
वहीँ पड़ी थी छुप के
मासूमियत भी कहीं
जिसे पाने की तमन्ना लिए चले थे कभी
अपनी ख़ामोशी भी वहीँ..
और अपनी बात वहीँ बैठी थी !!
अपनी ही रफ़्तार में बहुत आगे..
उन्ही मोड़ों पे कहीं फुरसत छिपी बैठी थी
नज़र बढ़ी न उस तरफ,
न कदम थमे,
न देखा रुक के..
अपने दिन भी वहां थे और अपनी रात वहीँ बैठी थी!
जो दिल की आवाज़ पे ज़रा ठहरे होते
वही मिल जाती दबी हुई हंसी तुमको
वहीँ पड़ी थी छुप के
मासूमियत भी कहीं
जिसे पाने की तमन्ना लिए चले थे कभी
अपनी ख़ामोशी भी वहीँ..
और अपनी बात वहीँ बैठी थी !!
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